कोरोना : बीबीएमपी को नहीं मिल रहे चिकित्सक, नर्स


– अन्य स्वास्थ्यकर्मियों ने भी मोड़ा मुंह
– आवेदकों की संख्या बेहद कम

बेंगलूरु. कोरोना महामारी (Corona Pandemic) के बीच चिकित्सकों व नर्सों सहित अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की कमी से जूझ रहा बृहद बेंगलूरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) व स्वास्थ्य विभाग इन्हें अनुबंध पर रखना चाहता है। लेकिन, मांग की तुलना में आवेदकों की संख्या बेहद कम है। इससे सरकार की चुनौतियां बढ़ गई हैं।

कर्नाटक (Karnataka) प्रदेश स्वास्थ्य और संविदात्मक एवं आउटसोर्स रोजगार संघ के अध्यक्ष के अध्यक्ष विश्वराध्य यमोजी ने बताया कि महामारी के दस्तक देने के बाद करीब 2000 एमबीबीएस और आयुष चिकित्सकों सहित दंत चिकित्सक और नर्सों को भर्ती किया गया था। सेवा भाव व कोरोना के खिलाफ जारी लड़ाई में सरकार का साथ देने के लिए सभी ने स्वास्थ्य विभाग का हाथ थामा था। लेकिन, सरकारी रवैये ने सबको हताहत कर छोड़ दिया है। कम वेतन, प्रोत्साहन राशि के भुगतान में देरी, नौकरी असुरक्षा और स्थाई स्वास्थ्य कर्मचारियों को प्राथमिकता देना सरकार पर भारी पड़ी। कई चिकित्सकों ने शिकायत की कि उन्हें गैर चिकित्सीय कार्य करने पर मजबूर किया जा रहा है।

30-40 ने छोड़ी नौकरी
बीबीएमपी से जुड़े 30-40 फीसदी नर्स व चिकित्सक नौकरी छोड़ चुके हैं। कोरोना की दूसरी लहर के दस्तक से बिगड़े हालातों के बीच सरकार ने लंबित वेतन व प्रोत्साहन राशि के भुगतान के लिए फंड जारी की। बीबीएमपी के एक अधिकारी के अनुसार कई स्वास्थ्यकर्मियों ने भुगतान के बाद नौकरी छोड़ दी।

पहले पहुंचते थे पांच गुना ज्यादा आवेदक
यमोजी ने बताया कि बीबीएमपी ने भर्ती के लिए विज्ञापन दिया है। अब तक 262 चिकित्सक व 112 नर्सों को ही नौकरी पर रखने में कामयाबी मिली है जबकि गत वर्ष 20 नौकरी के लिए 100 स्वास्थ्यकर्मी आवेदन करते थे। पश्चिमी क्षेत्र में बड़ी संख्या में नियुक्तियां हुईं। अप्रेल से अब तक 92 चिकित्सक, 17 नर्स व 20 स्वाब कलेक्टर नियुक्त किए गए हैं।

हालांकि, जोनल संयुक्त आयुक्त बसवराज एस. के अनुसार परिचालन जरूरतों के कारण इस क्षेत्र में नियुक्तियों ज्यादा हुईं। उन्होंने कहा कि कोविड के मामले अचानक बढऩे से अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत पड़ी है। होम आइसोलेशन मरीजों पर निगरानी, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग व जांच आदि कार्यों के लिए स्वास्थ्य कर्मियों की जरूरत है।

वेतन असमानता
नौकरी छोड़ चुके स्वास्थ्यकर्मी सरकार से खुश नहीं हैं। इनके अनुसार सरकार इन्हें खिलौना समझती है। इस्तेमाल कर फेंक देती है। दंत चिकित्सक, आयुष चिकित्सक और एमबीबीएस चिकित्सक एक ही काम करते हैं। एमबीबीएस चिकित्सकों चिकित्सकों को प्रतिमाह 60 हजार रुपए का वेतन मिलता है। लेकिन, दंत व आयुष चिकित्सकों को महज 40 हजार प्रतिमाह से संतोष करना पड़ता है। नर्सेस और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की हालत और खराब है। सरकार कर्मचारियों को वह भुगतान नहीं कर रही है जिसके वादा किया था। कर्मचारियों का मनोबल टूटा है।

सैंपल की कमी
एक संविदा चिकित्सक ने बताया कि प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्र को रोजाना 350 आरटी-पीसीआर और 100 रैपिड एंटीजन जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन, जांच सैंपल अपर्याप्त हैं। लॉकडाउन के कारण सड़क पर लोग नहीं हैं।

इसलिए भी समस्या
बुनियादी चिकित्सा ढांचे में वृद्धि से भी स्वास्थ्य कर्मियों की किल्लत हुई है। बीबीएमपी 48 कोविड देखभाल और ट्राइज केंद्रों सहित 12 ऑक्सीजन स्थिरीकरण केंद्रों को संचालन कर रही है। छह मई तक इन केंद्रों पर कुल 2,088 बिस्तर थे। लेकिन, 17 मई तक बिस्तरों की संख्या 3,041 पहुंच गई।

भर्ती प्रक्रिया विकेंद्रीकृत
बीबीएमपी के मुख्य आयुक्त गौरव गुप्ता के अनुसार नए केंद्रों के कारण स्वास्थ्य कर्मियों की जरूरत नहीं पड़ी है। भर्ती को विकेंद्रीकृत किया गया है और जोनल अधिकारियों पर छोड़ दिया गया है। आवश्यकता के आधार पर भर्ती की जाती है। हालांकि, जांच में मदद के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की संख्या बढ़ा दी गई है।

बढ़ा बोझ
कर्नाटक एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (केएआरडी) के अनुसार पीजी चिकित्सकों पर काम को बोझ बढ़ता जा रहा है। कारण जो भी हो, नए स्वास्थ्य कर्मियों के आगे नहीं आने से परेशानी और बढ़ेगी। सरकार पीजी चिकित्सकों का भी इस्तेमाल कर रही है। पीजी चिकित्सक प्रशिक्षण से वंचित हैं।

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