ब्रह्मचारी की साधना वरदान रूप बनती है-समकित मुनि


उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन

बेंगलूरु. अशोकनगर शूले जैन स्थानक में श्रमण संघीय डॉ. समकित मुनि ने उतराध्ययन सूत्र का वाचन करते हुए कहा ब्रह्मचर्य की साधना यदि केवल तन से होती मन से नहीं होती तो ब्रह्मचर्य का पालन करके भी धर्म से भ्रष्ट होने की संभावना बनी रहती है। तन योगी का और मन वासना का हो जाने पर, तन मन की परस्पर विरोधी वृत्तियों के कारण ब्रह्मचर्य की साधना खत्म हो जाती है। जिस ब्रह्मचर्य से सुख का जन्म हो सकता है, उसी से व्यक्ति अपनी नादानी से रोग का जन्म भी कर सकता है। ब्रह्मचर्य प्रसन्नता का कारण है तो बीमारी का कारण भी है। ब्रह्मचर्य के साधक को किन दस बातों का पालन करना चाहिए वह बताते हुए मुनि ने कहा स्त्री-पुरुष एक साथ न रहें। इससे पाप के रास्ते खुलते हैं। कोई भी पुरुष स्त्री के साथ अधिक वार्तालाप न करे। एक आसन पर न बैठें यानी अपना आसन अलग रखें किसी के आसन का उपयोग न करें। किसी को भी टकटकी लगाकर नहीं देखना। छिपकर किसी की बात अथवा हास्य सुनना। पूर्व में भोगे भोगों का चिंतन न करना। गरिष्ठ भोजन विकार बढ़ाता है। इसलिए उसका त्याग करना। सात्विक (साधारण) भोजन भी भूख से कम ग्रहण करना। सजने सवरने का त्याग करना, हमारी सजावट किसी का मन विकारी बना सकती है, फैशन परस्ती से दूर रहे। मनोज्ञ शब्द एवं रूप के पीछे पागल न बने।
मुनि ने कहा इन बातों का पालन करने वाले ब्रह्मचारी की साधना वरदान रूप बनती है। जो इन नियमों का पालन नहीं करता है वह अपनी ही साधना के प्रति शंकासील हो जाता है। मन भोगी बन सकता है, उन्मादी हो सकता है, शीघ्र ही मौत के मुंह में पहुंचा दे ऐसे दीर्घ कालीन रोग लग सकते हैं, तथा वह जिनेंद्र के धर्म से भ्रष्ट हो जाता है।
मुनि ने कहा संत का पापी होना यह भयंकर स्थिति है। संत पापी बन जाता है तो सीता का सुरक्षित रह पाना कठिन हो जाता है। गुंडे से बचना आसान है लेकिन संत यदि गुंडा बन जाए तो बचना मुश्किल होता है। श्रद्धा एवं आस्था से संत चरणों में पहुंचा भक्त जब जान लेता है कि जिसे मैं भगवान समझ कर पूजा कर रहा था वह भेडियिा है, पापी है, तब लोगों की आस्था दम तोड़ देती है। ऊपर से सफेद हैं परंतु मन काला न रखें। मन भी उजला होना चाहिए। प्रेमकुमार कोठारी ने बताया कि 13 नवंबर से तीन दिवसीय पंचामृत विधान का कार्यक्रम मुनि के सानिध्य में होगा।



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