मनरेगा: कोविड काल में पकड़ी रफ्तार, पांच माह में ही हो गया साल भर के बराबर काम


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ब्लॉक में जिस मनरेगा योजना को परवान चढ़ने में मुश्किल होती थी, वही मनरेगा योजना कोविड काल में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का सशक्त माध्यम बनी है। पिछले साल 12 महीने में जितने बजट का काम हुआ था, करीब उतने बजट का काम इस बार पांच महीने में ही हो गया है।

यही गति रही तो इस वित्तीय वर्ष के खत्म होने तक मनरेगा पिछले साल के मुकाबले कहीं ज्यादा लोगों को रोजगार दे चुकी होगी। हालांकि योजना प्रवासियों को रोजगार देने में नाकाम साबित हुई है, क्योंकि घर लौटे प्रवासियों में श्रमिक वर्ग के कम ही लोग शामिल हैं।

हल्द्वानी ब्लॉक की 60 ग्राम पंचायतों में मनरेगा योजना के तहत काम होता है। इस साल लॉकडाउन की वजह से वितीय वर्ष की शुरुआत में मनरेगा के तहत अप्रैल और मई में काम नहीं हुआ। अनलॉक के चरण शुरू होने के बाद ठीक तरह से जून से मनरेगा में काम को गति मिली। पांच महीने में ही अब तक सभी ग्राम पंचायतों में 2.60 करोड़ का काम हो चुका है। इसमें 54 लाख को छोड़ बाकी सभी का भुगतान भी कर दिया गया है। बकाया रकम का भी जल्द ही भुगतान होने की उम्मीद है। 

इस वितीय वर्ष में अभी तक 2250 लोगों को मनरेगा से रोजगार दिया गया है और 54930 मानव दिवसों का काम हो चुका है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में मनरेगा के तहत हल्द्वानी ब्लॉक में 2.63 करोड़ का ही काम हुआ था। कुल 2816 लोगों को रोजगार दिया गया और 68000 मानव दिवसों में काम हुआ है। अभी इस वित्तीय वर्ष के खत्म होने में पांच माह का समय बाकी है। ऐसे में इस साल मनरेगा में पिछले साल के सभी रिकार्ड टूटने के आसार बन चुके हैं।

मनरेगा के तहत ब्लॉक में सबसे ज्यादा सिंचाई गूलों, सुरक्षा दीवारों का निर्माण हुआ है। इसके अलावा रेशम, उद्यान विभाग के तहत पौधे रोपे जाने के काम के एवज में भी लोगों को भुगतान किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए व्यक्तिगत काम जैसे शौचालय, पशुबाड़े का निर्माण योजना के लाभार्थी पात्रों से ही करवाकर उन्हें दोगुना लाभ दिया गया।  लॉकडाउन के समय में ज्यादा से ज्यादा लोग योजना से जुड़े।

यहां योजना रही नाकाम

कोविड काल में मनरेगा गांव में रोजगार को गति देने में कामयाब हुई वहीं प्रवासियों को लुभाने में यह योजना खास सफल नहीं हुई। केवल 10 प्रवासियों को ही योजना के तहत लाभ मिला। प्रवासियों में श्रमिक काम से जुड़े कम लोग होने की वजह से मनरेगा के प्रति उनका कम रुझान रहा।

शहरीकरण का दबाव झेलती थी योजना

पहले जब हल्द्वानी ब्लॉक में 84 ग्राम पंचायतें थीं तब मनरेगा के तहत कई गांव ऐसे थे जिनमें काम नहीं हुआ था। मल्ली बमोरी, तल्ली बमोरी, मुखानी ऐसी ग्राम सभाएं थीं जिनमें मनरेगा का कोई मजदूर ही नहीं मिला। बाद में 24 ग्राम सभाएं नगर निगम में शामिल हो गईं। अभी शहर से लगीं कुछ ग्राम सभाओं में मनरेगा के लिए मजदूर मिलना मुश्किल हो जाता है।

व्यक्तिगत कामों में पात्रों से ही निर्माण कार्य करवाने से मनरेगा में गति आई है। इसके लिए लोग आवेदन कर रहे हैं। – निर्मला जोशी, बीडीओ, विकासखण्ड हल्द्वानी

ब्लॉक में जिस मनरेगा योजना को परवान चढ़ने में मुश्किल होती थी, वही मनरेगा योजना कोविड काल में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का सशक्त माध्यम बनी है। पिछले साल 12 महीने में जितने बजट का काम हुआ था, करीब उतने बजट का काम इस बार पांच महीने में ही हो गया है।

यही गति रही तो इस वित्तीय वर्ष के खत्म होने तक मनरेगा पिछले साल के मुकाबले कहीं ज्यादा लोगों को रोजगार दे चुकी होगी। हालांकि योजना प्रवासियों को रोजगार देने में नाकाम साबित हुई है, क्योंकि घर लौटे प्रवासियों में श्रमिक वर्ग के कम ही लोग शामिल हैं।

हल्द्वानी ब्लॉक की 60 ग्राम पंचायतों में मनरेगा योजना के तहत काम होता है। इस साल लॉकडाउन की वजह से वितीय वर्ष की शुरुआत में मनरेगा के तहत अप्रैल और मई में काम नहीं हुआ। अनलॉक के चरण शुरू होने के बाद ठीक तरह से जून से मनरेगा में काम को गति मिली। पांच महीने में ही अब तक सभी ग्राम पंचायतों में 2.60 करोड़ का काम हो चुका है। इसमें 54 लाख को छोड़ बाकी सभी का भुगतान भी कर दिया गया है। बकाया रकम का भी जल्द ही भुगतान होने की उम्मीद है। 

इस वितीय वर्ष में अभी तक 2250 लोगों को मनरेगा से रोजगार दिया गया है और 54930 मानव दिवसों का काम हो चुका है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में मनरेगा के तहत हल्द्वानी ब्लॉक में 2.63 करोड़ का ही काम हुआ था। कुल 2816 लोगों को रोजगार दिया गया और 68000 मानव दिवसों में काम हुआ है। अभी इस वित्तीय वर्ष के खत्म होने में पांच माह का समय बाकी है। ऐसे में इस साल मनरेगा में पिछले साल के सभी रिकार्ड टूटने के आसार बन चुके हैं।


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