मन रूपी घोड़े पर ज्ञान की लगाम लगाएं-देवेन्द्र सागर


बेंगलूरु. आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने सलोत जैन आराधना भवन में कहा की हम खुलकर स्वीकार भले न करें, लेकिन यह सच है कि आज भी ज्यादातर लोग अपने जीवन के छोटे-बड़े फैसले के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। बड़े-बुजुर्गों या अनुभवी जनों से सलाह लेना एक अलग बात है, पर मुश्किल यह है कि वे तोता-रटंत ज्ञानियों के दरवाजे पर भी पहुंच जाते हैं कि आगे क्या करना चाहिए? बात यहीं तक नहीं ठहरती है। वे कुंडली-दोष का पता लगाकर ज्योतिषियों से यह भी पूछने लगते हैं कि कौन सा टोटका अपनाएं जो उनके भविष्य को दिशा दे सके। दरअसल यह असमंजस की स्थिति है, जो खुद पर अविश्वास से पनपती है। सोचकर देखें कि जो बातें आपकी रुचि से जुड़ी हुई हों, उसके बारे में दूसरा कोई क्या बता सकता है। इसमें खुद का फैसला ही मायने रखता है। यह असमंजस आपको तब और भी दिग्भ्रमित करने लगता है जब किसी की सलाह से आपके मन की इच्छा का मेल नहीं बैठता है। आप चाहते कुछ हैं लेकिन होने लगता है कुछ। वे आगे बोले की आप पर दोहरा बोझ लद जाता है कि किसकी सुनें, उनकी या अपने मन की? यह जो दो नावों पर सवार होने की अनिश्चितता है, यही फ्रस्ट्रेशन और असफलता की कहानी लिखता है। यह जरूरी नहीं कि हम सारे अनुभव खुद से लें, दूसरों की सफलता या विफलता को देखकर भी अपने लिए रास्ता तलाश सकते हैं। लेकिन किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले इस पर विचार अवश्य करना चाहिए कि अपना मन क्या कहता है और क्या चाहता है। जो लोग अपने मन की नहीं सुनते हैं, तय मानिए कि उनका लक्ष्य तक पहुंचने का सपना दिवास्वप्न बनकर रह जाता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि मन हमेशा दोहरी रणनीति के साथ चलता है। वह अगर आपको सही सलाह देता है तो भटकाता भी है। इसलिए मन को भी समझना बहुत जरूरी है। पूज्य आचार्य ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि आज भी यह सवाल सबके सामने उपस्थित है कि मन की चंचलता खत्म हो तो कैसे? हम पथ बदल लेते हैं, गुरु बदल लेते हैं, मंत्र बदल लेते हैं किंतु मन को बदलना आसान नहीं होता है। हमारा मन कभी-कभी तो ऐसा खेल करता है कि हमारी खुद की उसके साथ प्रतिद्वंद्विता शुरू हो जाती है, एक और बात का खयाल रखना जरूरी है कि मन को मालिक न बनने दें। आप जैसे ही असमंजस में पड़ते हैं, वह आपकी कमजोरी का फायदा उठाकर आपसे गलत फैसले कराने लगता है। समझना यह है कि हमारी जीवन-संरचना में बुद्धि, मन, इंद्रियां आदि मालिक नहीं हैं। मालिक है चेतन। मन चेतन के अधीन कैसे हो, मन पर विजय कैसे प्राप्त हो, इस प्रश्न का उत्तर है, अभ्यास और वैराग्य, धर्म-शिक्षा, ज्ञान और विवेक। जब भी मन का घोड़ा बेलगाम होकर दौड़े, हम उस पर ‘ज्ञान’ की लगाम लगाएं और ‘विवेक’ का चाबुक लगाएं। इस निरंतर अभ्यास से मन का निग्रह हो सकेगा।



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