‘लाहौर कॉन्फीडेंशियल’ का प्रीमियर दिसम्बर में, ओटीटी पर भी जासूसी किस्से


-दिनेश ठाकुर
पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के तनावपूर्ण रिश्तों की पृष्ठभूमि पर फिल्में बनाने का सिलसिला पिछले ढाई दशक में ज्यादा तेज हुआ है। इससे पहले सख्त नियमों के कारण इस तरह की फिल्में कम बनती थीं। फिल्मकार जगन शर्मा की ‘भूल न जाना’ इन्हीं नियमों के कारण सिनेमाघरों में नहीं पहुंच सकी। भारत-चीन के 1962 के युद्ध पर आधारित इस फिल्म को 1972 में सेंसर बोर्ड ( Cencor Board ) की हरी झंडी मिल गई थी, लेकिन सरकार ने इसके प्रदर्शन पर यह कहकर रोक लगा दी कि इससे पड़ोसी देश के साथ रिश्तों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। अब फिल्में उस तरह की सख्ती से आजाद हैं। इसीलिए ‘गदर’ ( Gadar Movie ) में सनी देओल ( Sunny Deol ) को पाकिस्तान में हैंडपम्प उखाड़ते दिखाया गया, तो ‘फैंटम’ में सैफ अली खान भारतीय जासूस बनकर आतंकियों के सफाए के लिए पाकिस्तान पहुंच जाते हैं। भारतीय जासूसों की बहादुरी के कारनामे ‘एक था टाइगर’, ‘टाइगर जिंदा है’, ‘राजी’, ‘विश्वरूपम’, ‘बैंग-बैंग’, ‘नाम शबाना’ आदि फिल्मों में भी दिखाए जा चुके हैं। ‘पलटन’ की नाकामी ने जे.पी. दत्ता का जोश ठंडा कर दिया, वर्ना इस तरह की मसालेदार जासूसी फिल्म वे भी बना चुके होते।

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खुफिया मिशन और प्रेम कहानी
अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी जासूसी के फार्मूलों वाली वेब सीरीज और फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया है। ‘मुझसे दोस्ती करोगे’, ‘हम तुम’, ‘फना’ और ‘तेरी मेरी कहानी’ जैसी फिल्में बनाने वाले कुणाल कोहली ने एक ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए ‘लाहौर कॉन्फीडेंशियल’ ( Lahore Confidential ) नाम की फिल्म बनाई है। इसका 11 दिसम्बर को डिजिटल प्रीमियर होगा। ‘राजी’ में जासूसी के लिए आलिया भट्ट एक पाकिस्तानी फौजी से शादी कर वहां गई थीं। ‘लाहौर कॉन्फीडेंशियल’ में भारतीय विधवा (रिचा चड्ढा) ( Richa Chaddha ) को खुफिया मिशन पर पाकिस्तान भेजा जाता है। वहां एक पाक जासूस से उनकी प्रेम कहानी शुरू हो जाती है। ‘एक था टाइगर’ ( Ek Tha Tiger Movie ) में सलमान खान ( Salman Khan ) और कैटरीना कैफ के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ था। रणधीर कपूर के निर्देशन में बनी ‘हिना’ में इधर के नायक और उधर की नायिका की प्रेम कहानी ज्यादा तार्किक, सहज और भावनाओं की जमीन पर खड़ी नजर आती है।

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आ चुकी है ‘लंदन कॉन्फीडेंशियल’
सितम्बर में ‘लंदन कॉन्फीडेंशियल’ नाम की जासूसी फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी है। यह निहायत कमजोर फिल्म रही, जिसमें रील-दर-रील तर्कों की धज्जियां उड़ाई गईं। इसमें दिखाया गया कि चीन एक खतरनाक वायरस भारत की सीमा पर छोडऩे वाला है। लंदन में एक भारतीय खुफिया एजेंट को इसकी भनक लग जाती है, लेकिन इससे पहले कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर वह चीन की साजिश का खुलासा करता, उसे मार दिया जाता है। बाद में एक दूसरा भारतीय एजेंट साजिश को नाकाम करता है। फिल्मों में सब कुछ कितना आसान होता है।

बगैर वीजा-पासपोर्ट पहुंचे पाकिस्तान
ऐसी आसानी नहीं होती, तो ‘बजरंगी भाईजान’ में तालियां लूटने वाले सीन कैसे रचे जाते। हालांकि यह जासूसी फिल्म नहीं है, लेकिन इसमें भी सलमान खान बगैर वीजा- पासपोर्ट पाकिस्तान पहुंच गए थे। भारत में उन्हें जो पाकिस्तानी बच्ची लावारिस हालत में मिली थी, कायदे से अगर उसे दिल्ली में पाकिस्तान दूतावास को सौंप दिया जाता, तो उसे उसके देश भेजने का बंदोबस्त हो जाता। लेकिन अगर फिल्में कायदे पर चलने लगें, तो समझिए नायक की भैंस गई पानी में। उसे चोरी-छिपे किसी देश में जाकर स्टंट और एक्शन दिखाने का मौका कैसे मिलेगा। डायरेक्टर मेहरबान, तो फिल्म का हीरो सर्व शक्तिमान।

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