श्रीलंका में चीन के साइन बोर्ड लगने पर मचा बवाल, बाद में फैसला वापस लिया


श्रीलंका में चीन अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक दखल देने की कोशिश कर रहा है। साइन बोर्डों पर श्रीलंका की अधिकारिक भाषा तामिल न होने पर बवाल मचा।

बीजिंग। चीन अपने पड़ोसी देशों से सबंध बिगाड़ता जा रहा है। चाहे वह नेपाल,म्यांमार या श्रीलंका हो वह सबसे अपनी दुश्मनी बढ़ाता जा रहा है। वह अपनी विस्तारवादी सोच को बढ़ावा दे रहा है। नेपाल के बाद अब श्रीलंका में भी चीन ने अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक दखल देने की कोशिश की है।

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श्रीलंका में हाल ही में दो सरकारी परियोजनाओं के साइन बोर्डों पर वहां की अधिकारिक और दक्षिण भारतीय भाषा तमिल को हटाकर चीनी भाषा को जगह दी गई है।कोलंबो में सेंट्रल पार्क का निर्माण कर रहा चीन वहां पर तमिल भाषा की जगह चीन भाषा मंडारिन को जगह दी, जिसके बाद यहां पर हंगाम मच गया।

साइन बोर्डों पर चीनी भाषा का इस्तेमाल

श्रीलंकाई अटर्नी जनरल दप्पुला दे लिवेरा ने सिघंला (श्रीलंका की मूल भाषा), मंडारिन और अंग्रेजी भाषाओं वाले साइन बोर्ड का अनावरण किया था। जिसके बाद श्रीलंका में विवाद खड़ा हो गया। इन साइन बोर्डों पर श्रीलंका की अधिकारिक भाषा तामिल न होने पर बवाल मच गया। लोगों ने सरकार से पूछना शुरू कर दिया कि अपनी भाषा को क्यों नहीं तरजीह दी गई। यह श्रीलंका की तीन अधिकारिक भाषाओं (सिंघला, तामिल और अंग्रेजी) की नीति के विरुद्ध है। यह विवाद उस वक्त ज्यादा बढ़ गया, जब चीन ने अटर्नी जनरल डिपार्टमेंट को एक स्मार्ट लाइब्रेरी भेंट की।

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सोशल मीडिया पर इसे लेकर कड़ी आलोचना होने लगी। लोगों ने चीन की इस हरकत पर आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद साइन बोर्ड को तत्काल हटा लिया गया। जब मीडिया ने इस पर अटर्नी जनरल कार्यालय से प्रतिक्रिया लेनी चाही तो कार्यालय के अधिकारी ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।

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