सोशल मीडिया ने कम की दूरी: भारत और पाकिस्तान के लोगों ने वर्चुअल स्पेस पर खोली वार्ता की खिड़की, सतलुज की धाराएं और गांव तलाश रहे


  • Hindi News
  • Local
  • Delhi ncr
  • The People Of India And Pakistan Opened The Window Of Dialogue On The Virtual Space, Searching The Streams And Villages Of The Sutlej

नई दिल्ली3 घंटे पहलेलेखक: दलजीत अमी

  • कॉपी लिंक
70 साल पहले दो देशों में बंटे लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझी विरासत और संस्कृति के संवाद कर रहे हैं। - Dainik Bhaskar

70 साल पहले दो देशों में बंटे लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझी विरासत और संस्कृति के संवाद कर रहे हैं।

  • सीमापार आवाजाही भले बंद हो पर साझी संस्कृति और इतिहास पर चर्चा जारी

सरहदी विवादों और कोरोना की पाबंदियों के चलते भारत और पाकिस्तान के बीच आना-जाना भले बंद हो लेकिन वर्चुअल स्पेस ने जमीनी दूरी कम की है। 70 साल पहले दो देशों में बंटे लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझी विरासत और संस्कृति के संवाद कर रहे हैं। कोई सतलुज की धाराओं को याद कर रहा है तो कोई विस्थापन के बाद छूटे गांव और लोगों को तलाश रहा है।

चंडीगढ़ से जितेंद्र मौहर और पाकिस्तान के फैसलाबाद से तौहीद चट्‌ठा ऐसे ही चैनल “लायलपुर यंग हिस्टोरियन क्लब’ पर कहते हैं, “सतलुज की एक धारा गिद्दड़पिंडी और पंजगरायिआं गांव के पास से बहती थी। ये गांव यहां लायलपुर के पास हैं।’ गूगल पर देखें तो चंडीगढ़ और फैसलाबाद के बीच फासला 356 किमी है, लेकिन इस दूरी को तय करने में लगने वाले समय और यातायात के बारे में गूगल नहीं बता पाता। दरअसल, इन दो शहरों के बीच में पड़ने वाली अंतरराष्ट्रीय सरहद दुनिया की सबसे ज्यादा सैनिक तैनाती वाली सरहदों में एक है। तनातनी और कोरोना की पाबंदियों के बीच वर्चुअल संवाद की सहूलियत यह है कि वीजा अफसरों और राजनयिक इजाजतों की पाबंदी नहीं है।

तौहीद कहते हैं कि साझा इतिहास समझने-समझाने के लिए क्लब बना तो उससे “लायलपुर’ शहर का नाम जुड़ा, जो अब नक्शे पर नहीं है। लायलपुर 1892 में बसाया गया था। उत्तर साम्राज्यवादी दौर में 1979 में लायलपुर का नाम सऊदी अरब के किंग फैसल के नाम पर फैसलाबाद हो गया।

लायलपुर का इतिहास साम्राज्यवाद विरोधी लहर की कई घटनाओं और शख्सियतों से जुड़े होने के कारण चार दशक बाद भी इस शहर को लोग पुराने नाम से जानते हैं। पिछले दिनों जितेंद्र ने किसान आंदोलन के बारे में तजुर्बा साझा किया तो लायलपुर, चाचा अजीत सिंह और बांके दयाल का जिक्र आया।

बीसवीं सदी के पहले दशक में हुए किसान आंदोलन “पगड़ी संभाल जट्टा’ के नेता रहे अजीत सिंह शहीद भगत सिंह के चाचा थे। उस आंदोलन की पहचान बना “पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल…’ तराना बांके दयाल ने लिखा था और यह लायलपुर जलसे में गाया गया था। तौहीद ने कहा, हमारे पूरे इलाके का संबंध किसान आंदोलनों से रहा है। बेशक किसान आंदोलन दिल्ली या पूर्वी पंजाब (भारत) में हो रहा है पर वहां भी अजीत सिंह और बांके दयाल का जिक्र लगातार हो रहा है।

दुनियाभर के वक्ता और श्रोता होते हैं शामिल

ऐसा ही ऑनलाइन मंच “पंजाब दर्शन’ है। इसे चलाने वालों में शामिल चार लोग रामगढ़िया कॉलेज फगवाड़ा के अध्यापक हैं। ‘पंजाब दर्शन’ लेक्चर सीरीज में अलग-अलग शहरों और मुल्कों के वक्ता शामिल होते हैं। इस पर लाहौर से इतिहासकार नैनसुख ने पंजाब के इतिहास पर तीन भाषण दिए हैं। रामगरिया कॉलेज फगवाड़ा के अध्यापक अवतार सिंह ने बताया, हम यह समझना चाहते हैं कि पंजाब दिखाई कैसा देता है और सोच कैसी रखता है।

दशमेश खालसा कॉलेज श्री मुक्तसर साहिब के अध्यापक लखबीर सिंह कॉलेज के चैनल पर भाषण शृंखला चला रहे हैं, जिस पर दुनियाभर के विद्वान विचार रखते हैं। इनमें पाकिस्तानी मूल के आयरलैंड निवासी महमूद अवान, स्वीडन में रहने वाले पाकिस्तानी इतिहासकार इश्तियाक अहमद भी शामिल हैं। वोल्वरहैम्पटन यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी की प्रोफेसर मीना ढांडा लायलपुर क्लब की वक्ता रहीं।

बंटवारे के जख्मों पर मरहम लगाता “पंजाबी लहर’

सोशल मीडिया चैनल ‘पंजाबी लहर’ विभाजन के कारण विस्थापित लोगों को उनके पैतृक गांव दिखाने या बिछड़े दोस्तों से मिलवाने की कड़ी बना है। इसे फैसलाबाद के नासिर ढिल्लों और लवली सिंह चलाते हैं। लवली विभाजन के प्रत्यक्षदर्शियों का साक्षात्कार करते हैं।

इनके पेज पर आने वाला कोई व्यक्ति विभाजन के दौर में उजड़ा अपना गांव देखना चाहता है तो कोई गांव वालों से बात करना चाहता है। पंजाबी में होने वाले संवादों में कभी सरहद के दोनों ओर की कहावतों, मुहावरों पर चर्चा होती है तो कभी रीति-रिवाजों पर। सरहद के दोनों ओर के लोग बातें साझा करते हैं और सुनते हैं।

खबरें और भी हैं…



Source link